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Showing posts from June, 2020

જય જગન્નાથ.૨૦૨૦

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*ગગન ગજ્જે ને મોરલા બોલેં.. મીં આયો, મીં આયો.. મથે ચમકેતી વીજ, હલો બેલી કચ્છડે મેં.. આવઇ પાંજી અષાદી બીજ.. કચ્છી માડુઓના નવા વર્ષ નિમિત્તે  આપને ને આપના પરિવાર ને મારા ને મારા પરિવાર તરફથી હાર્દિક શુભકામના* 🙏🏻 *જય જગન્નાથ* 🙏🏻🛕 *જય દ્વારકાધીશ*🙏🏻🚩

બગસરા પરશુરામ ધામ

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ભગવાન શ્રી પરશુરામ દાદાને ફુલહાર વેચાતા ન લેવા પડે તે માટે આજે પરશુરામ ધામ મંદિર બગસરા ખાતે ગાર્ડન ફુલછોડ નું વૃક્ષારોપણ કરવામાં આવેલ છે...લી. મુકેશ જોષી પર્યાવરણ શુદ્ધ  દરેક વ્યક્તિ નો સાથ સહકાર સાથે . પર્યાવરણ જતન પરશુરામ ધામ  બગસરા માં દેવ પૂજન માટે દરેક પ્રકાર ના ફૂલ મળી રહે તે માટે વૃક્ષા રોપણ .

કેન્દ્ર સરકાર દ્વારા ચીન ને ઝટકો.

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ગુજરાત ન્યૂઝ સમર્થન ન્યુઝ કેન્દ્ર સરકાર નો ચીન ને ઝટકો આપતો મોટો નિર્ણય Bsnl અને MTN  માંથી તાત્કાલિક ધોરણે તમામ ચીની ઉપકરણ હટાવાશે, ચીન સાથે તમામ ટેન્ડર રદ્દ . News reporter  Mayur jani bhavnagar 

नर्मदा नदी के पत्थर में हे शिव ।। पोस्ट by shashtriji bhavnagar ।।

नर्मदा नदी के हर पत्थर में है शिव, आखिर क्यों ? नर्मदेश्वर शिवलिंग के सम्बन्ध में एक धार्मिक कथा है –भारतवर्ष में गंगा, यमुना, नर्मदा और सरस्वती ये चार नदियां सर्वश्रेष्ठ हैं। इनमें भी इस भूमण्डल पर गंगा की समता करने वाली कोई नदी नहीं है। प्राचीनकाल में नर्मदा नदी ने बहुत वर्षों तक तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने वर मांगने को कहा। तब नर्मदाजी ने कहा–’ब्रह्मन्! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे गंगाजी के समान कर दीजिए।’ब्रह्माजी ने मुस्कराते हुए कहा–’यदि कोई दूसरा देवता भगवान शिव की बराबरी कर ले, कोई दूसरा पुरुष भगवान विष्णु के समान हो जाए, कोई दूसरी नारी पार्वतीजी की समानता कर ले और कोई दूसरी नगरी काशीपुरी की बराबरी कर सके तो कोई दूसरी नदी भी गंगा के समान हो सकती है। ब्रह्माजी की बात सुनकर नर्मदा उनके वरदान का त्याग करके काशी चली गयीं और वहां पिलपिलातीर्थ में शिवलिंग की स्थापना करके तप करने लगीं। भगवान शंकर उन पर बहुत प्रसन्न हुए और वर मांगने के लिए कहा। तब नर्मदा ने कहा–’भगवन्! तुच्छ वर मांगने से क्या लाभ? बस आपके चरणकमलों में मेरी भक्ति बनी रहे। नर्मद...

वेद तंत्र दोनों की व्याख्या

वेद-तन्त्र दोनों की व्याख्या।  पाशबद्धो भवेज्जीवः पाशमुक्तो सदाशिवः।  पश्यक-कश्यप। #पाशबद्ध_पशु #यज्ञविवेक जो भाग्य मात्र पर निर्भर है, वह पाश में है...जो पाश में है, वह पशु है...पशु होने के लिए चार पैर होने आवश्यक नहीं..सींग, पूंछ होना जरूरी नहीं...बिना सींग और पूंछ के भी पशु ही है, यदि उसकी प्रज्ञा जाग्रत नहीं है...प्रज्ञा विवेक में है और भाग्य जड़ है। रज्जू भी जड़ है, जड़ रज्जू से बंधा जीव बंधन में होता है...बंधन के पाश से वह पशु कहाता है...पशु का कोई उपाय नहीं..वह तो पैदा ही बंधन के लिए हुए है...गाय भैंस बंधे रहते हैं जंजीर से...वह जंजीर और कुछ नहीं, उनका भाग्य है...कुत्ते के गले में बिल्ली के गले में पट्टा बंधा है...वह उस बंधन में ही जीवन बिताने को अभिशप्त है...वह उसकी अवस्था है...क्योंकि वह बंधन के लिए उत्पन्न हुआ है...उसने कोई पाप नहीं किया..बस उसका विवेक जाग्रत न हुआ...जो जागृतविवेक होता है, वह कभी पशु नहीं होता...क्योंकि कोई उसको पाशबद्ध कर ही नहीं सकता...वन में सिंह को कोई सिंहासन लगाकर नहीं देता...वह अपने उद्यम से वन का स्वामी होता है...अपनी शक्ति को जानकर, अपने विवेक ...