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वेद तंत्र दोनों की व्याख्या

वेद-तन्त्र दोनों की व्याख्या।  पाशबद्धो भवेज्जीवः पाशमुक्तो सदाशिवः।  पश्यक-कश्यप। #पाशबद्ध_पशु #यज्ञविवेक जो भाग्य मात्र पर निर्भर है, वह पाश में है...जो पाश में है, वह पशु है...पशु होने के लिए चार पैर होने आवश्यक नहीं..सींग, पूंछ होना जरूरी नहीं...बिना सींग और पूंछ के भी पशु ही है, यदि उसकी प्रज्ञा जाग्रत नहीं है...प्रज्ञा विवेक में है और भाग्य जड़ है। रज्जू भी जड़ है, जड़ रज्जू से बंधा जीव बंधन में होता है...बंधन के पाश से वह पशु कहाता है...पशु का कोई उपाय नहीं..वह तो पैदा ही बंधन के लिए हुए है...गाय भैंस बंधे रहते हैं जंजीर से...वह जंजीर और कुछ नहीं, उनका भाग्य है...कुत्ते के गले में बिल्ली के गले में पट्टा बंधा है...वह उस बंधन में ही जीवन बिताने को अभिशप्त है...वह उसकी अवस्था है...क्योंकि वह बंधन के लिए उत्पन्न हुआ है...उसने कोई पाप नहीं किया..बस उसका विवेक जाग्रत न हुआ...जो जागृतविवेक होता है, वह कभी पशु नहीं होता...क्योंकि कोई उसको पाशबद्ध कर ही नहीं सकता...वन में सिंह को कोई सिंहासन लगाकर नहीं देता...वह अपने उद्यम से वन का स्वामी होता है...अपनी शक्ति को जानकर, अपने विवेक ...