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ब्रह्म देव

-ब्राह्मण बड़ा या संत- पूर्व समय की बात है एक बार ब्राह्मण और संत में वहस हो गई । संत बोले हम श्रेष्ठ हैं और ब्राह्मण बोले हम श्रेष्ठ है । संत बोले प्रभु की प्राप्ति के लिए हम अपने जन्मदाता माता-पिता का त्याग करते हैं साथ ही इस संसार के सभी संबंधों का त्याग करके प्रभु से नाता जोड़ते हैं इसलिए हम श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मण बोले हम अपना संपूर्ण जीवन समाज के लोगों के जीवन के दुख दूर करने तथा धर्म राष्ट्र संस्कृति के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन व्यतीत करते हैं इसलिए हम श्रेष्ठ हैं। विवाद बढ़ते बढ़ते इतना बढ़ गया कि संत तथा ब्राह्मण ब्रह्मा जी के पास पहुंचे संतो ने ब्रह्मा जी को प्रणाम किया साथ ही ब्राह्मणों ने भी ब्रह्मा जी को प्रणाम किया। ब्रह्मा जी ने प्रसन्नचित्त से संतो तथा ब्राह्मणों से आगमन का कारण पूछा...  संत बोले प्रभु हम दोनों आप ही की संतान हैं... परंतु हम दोनों में से श्रेष्ठ कौन है यह जानने की जिज्ञासा है। ब्रह्मा जी बोले संत तथा ब्राह्मणों की महिमा तो वेदों ने भी  गायी है संत हृदय नवनीत समाना...  अर्थात संतों का हृदय तो मक्खन की तरह होता है। संत दरस जिमि पातक टरहिं....